बुधवार, 2 नवंबर 2011


खत्म नहीं हुई है अभी

पानी से दबी थी एक हरी-भरी धरती

इंसानियत
इस धरती पर
तलाश रही थी जमीं
पाँव के नीचे

वह तलाश रही थी जमीन
और जमीन
उससे उतनी ही बिछुड़ती जा रही थी

पाँव और धरती के बीच
जल का सैलाब मोटा होता जा रहा था
और मोटी होती जा रही थी कोसी

जमीन पर कोसी थी
या जमीन कोसी में
कह पाना मुश्किल था

जो बात कही जा सकती थी
वह थी कोसी की अपरमीत तांडवत उल्लास
और उनके अंतहीन आँसुऔं की ताजी कहानी

यह कहानी
अभी खत्म नहीं हुई है
फिर शुरू होगी
अगले साल कहीं और से

टहल रहा है चाँदे

खुला आसमान
और नहाता चाँद
चाँदनी की बरसात में

बहुत दिनों बाद
देखा था चाँद को
बहुत दिनों बाद
आई थी याद किसी चाँदनी की

घर-दफ्तर की दौड़ में
हाँफ्ते समय को
कहाँ याद आता है
मालूम पड़ता है कब
उसके छत पर
टहल रहा है
एक चाँद धवल चाँदनी में

प्रेम की भाषा
बंद दरवाजे
खिड़िकियाँ बंद
हृदय-कपाट बंद इन्हीं-सा
सब कुछ बंद-बंद सा
इसे तोड़ने के लिए
अपनायी गुमनामी को छोड़ने के लिए
लाये कुछ गाछ फूलों के
मिट्टी भी भरी गमलों में
जल-फूहारें बरसायी
हहरायी बालकनी अपनी
दिल भी लगा उछलने उस दिन
देखा जब फुदकते दो प्रेमी मैनों को
प्रेम की भाषा में बतियाते
चोंच से चोंच भिड़ाते
खुजलाते डैनों को
अपनत्व के स्पर्श से
बालकनी के तारों पर

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011


पिता 

पिता
एक वट-वृक्ष होता है 
जहाँ विहग 
बेखौफ अपना घोसला बना सकते हैं 
दिनों गायब रह सकते हैं घर से 
इस उम्मीद के साथ  
कि लौटने पर सब कुछ यथावत मिलेगा 
बरगद की आँखें चमक उठेंगी 
उसकी उम्मीदें हरिया जाएंगी 
शीतल छाया विहँस उठेगी
अवसान हो जाता है जब बरगद का 
दिशाहीन विहग 
नए घोसले की तलाश में निकल जाते हैं 
अब उनके मन में एक खौफ होता है 
एक अनिश्चितता होती है 
एक अर्थहीनता होती है 
पश्चाताप होता है  - 
समय रहते बरगद के लिए कुछ न कर पाने का
जीवन का अर्थहीन हो जाने का

नहीं है समय हमारे पास


नहीं है समय हमारे पास


नहीं है समय हमारे पास
खंगाल रहें हैं हम
क्षण-क्षण
पूरी तत्परता के साथ
जीवन में फैले
इस महाअजीवन को

जी रहे हैं हम
इस आस के साथ
कभी तो आएगी वह सुबह
जब हम जिन्दगी को
देंगे कुछ क्षण उधार
संवाद के इस महोत्सव में
वह रख सके
जिससे अपनी बात

अभी नही है समय हमारे पास

खिलखिलाती लड़कियाँ

खिलखिलाती लड़कियाँ

मोबाइल पर
घंटों खिलखिलाती रहती हैं लड़कियाँ
खत्म ही नहीं होती उनकी बात
न जाने किन भावों-विचारों के
किन-किन खाइयों और  ऊच्चाइयों से
होकर वे गुजरती हैं
मगर जब भी वे हँसती हैं
एक आत्मीय अन्नद से सराबोर हो जाती हैं
फोन की एक घंटी
उन्हें सारा दिन
तरोताजा बनाये रखती है

ग़ज़ल, कविता
हाँ, यही वे नाम हैं
जो फोन से धीमे स्वर में निकलते हैं
और वे चहचहा उठती हैं
बनने लगती हैं उनकी योजनाएं
स्कूल जाने की, मिलने की, घुमने की,  खाने की
होकर बेखबर
क्या सोचता है उनका घर-समाज
धर्म और मजहब
उन्हें नहीं होती है दंगे की भनक
राजनीति की शनक
हँसते-बोलते वे
न जाने क्या-क्या सपने देखती हैं

जरूर
ये लड़कियाँ
कुछ बुन रही होती हैं
अपनी हँसी से, अपने सपनों से
पुरानी मान्यताओं को
धुन रही होती हैं



आँखों की भाषा

आँखों की भाषा

नहीं होता विश्वास 
तुम्हारी बातों पर 

होता भी कैसे 

जो तुम कहती हो 
उससे तुम्हारी आँखें 
सहमत नजर नहीं आतीं

मैं जानता हुँ 
आंखें कभी झूठ नहीं बोलती 
बोल भी नहीं सकती हैं
उन्हें सच पढ़ने की आदत है 
कहाँ छिप पाता है 
दिलों का भेद 
राडार सी संवेदी आँखों से

तुम्हारी गुरु-गम्भीर आँखों से 
मूक संवाद करने के बाद 
सोचता हूँ 
जब दुनिया की सारी भाषायें 
समाप्त हो जाएंगी 
तब भी आँखों की भाषा में  
जारी रहेगा दुनिया का संवाद